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सारे आशिकों का इंतकाल हो जाए।

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तेरे होंठ आज सुर्ख़ लाल हो जाए। मेरे दिल को तेरा मलाल हो जाए।। तेरी ख़ामोश पलकें झुक के जब उठें। सारे आशिकों का इंतकाल हो जाए।। डॉ.अमन शुक्ला शशांक

सड़ा हुआ कानून

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अब तक अदालतों की कालाबाजारी पर से कवियों का ध्यान कुछ भटक सा गया था लेकिन अब और नही।  अदालतों के चक्करों में बीत जाती सारी उम्र। न्याय के लिए यहां पे बीत जाती सारी उम्र।। लगता फैसले के पहले  इंसा मर जाएगा। किंतु कोई आशा नहीं न्याय मिल पाएगा।। अदालतों की कुर्सियां हैं धूल के चपेट में। आम आदमी है पेशकारों  की लपेट में।। नही कोई बात न्यायाधीश को बताने दें। अधिवक्ता के बिना जो कोर्ट में न आने दें।। शर्मसार संविधान को किए हुए हैं वो। 20 या पचास रूपये में बिके हुए हैं जो। न्याय- व्याय ,काले धंधे, बस यही सीख मिले। 20 या पचास रूपये देके जब तारीख मिले।। ऐसा नहीं न्यायाधीशों को पता नही है ये। लेखनी कवि की फालतू की कथा नही है ये।। चूस चूस खून अधिवक्ता हुए मालामाल।। (चक्कर काट आदमी होता रोज ही हलाल।) तारीख पे तारीख यहां मिलती है सालों साल। बेगुनाहों का यहां पे होता बुरा हाल है। माफियाओं को जेलों में मिलती फ्राई दाल है।। विष के समान है माहौल परिवेश का।। ऐसा घिसा पिटा है कानून मेरे देश का। ऐसे घिसे पिटे नियमों में सुधार कीजिए। कानून के काले पन्ने फाड़ फेंक दीजिए।। हर इक धार...

राजधानी

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दुनिया के सब देशों की रजधानी देखो सुंदर है। रजधानी में घटने वाली सभी कहानी सुंदर हैं। रजधानी के रखरखाव का इनसे सीखो कभी तरीका। लंदन देखो पेरिस देखो चाहे देखो अमरीका।। इन देशों के नेताओं में भी तो झगड़ा रहता है। लेकिन उनके झगड़ों में भी देश संवरता रहता है।। सब देशों की रजधानी तुम देखो जगमग होती है। अपनी दिल्ली सबसे पीछे बैठी बैठी रोती है।। सभी व्यवस्थाएं दिल्ली की जैसे दारू का क्वाटर हों। दिल्ली की हालत है ऐसी जैसे सड़े टमाटर हों। कालनेमि ने अन्ना के अनशन में वादा कर डाला। दिल्ली की पूरी जनता की बुद्धि को था हर डाला।। जिसने दिल्ली के लोगों की आंखों में  मिट्टी डाली। वादों में पानी बिजली से आंखों पे पट्टी डाली।  उसने दिल्ली नर्क बना दी देखो बोल रहा हूं मैं। सब देशों रजधानी से दिल्ली तोल रहा हूं मैं।। जो घर घर पानी देने का वादा बड़ा किया था जी। दिल्ली की आंखों में जो सपना खड़ा किया था जी।। कजरी ने उन कजरीले आंखों के सपने जला दिए। दिल्ली के अस्तित्व पुराने जो कुछ थे वो मिटा दिए। झीलें घर घर पहुंचाकर अब  स्वच्छ हवा वो खड़ा लिए। जिसने दारू के ठेकों पर देखो बच्चे पढ़ा दिए।। ऐसे ...

जिस मिट्टी में जन्म लिया उस मां को बांट नही सकता

देश बाटने वाले तो कुछ अंग्रेजो के हेटे थे। जो हंसकर बलिदान हुए वो भारत मां के बेटे थे।। अमन आपसे प्रेरित होता नित्य कर्तव्य के पथ पर। जैसे कोई योद्धा चढ़ता धर्म समर के रथ पर।। मै पुरखों के बलिदानों को व्यर्थ नही जाने दूंगा। मै सकुनी मामाओं को स्वांग नही रचाने दूंगा।। देखूं कितना दम है तुममें सुनलो तुम्हे सुनाऊंगा। सदा सनातन में जन्मा में हूं सदा सनातन गाऊंगा। और सनातन में क्या दम है तुम सबको दिखलाऊंगाके चक्र सुदर्शन धारी कृष्णा ने गीता उपदेश दिया जो। श्री राम ने धर्म संकटों में धर्मोपदेश दिया जो।।। वही धर्म और वही कर्म मै लेखन में दिखलाऊंगा। जैसे सूर्य नही थकता है वैसे ही डट जाऊंगा जिस मिट्टी में है जन्मबीके लिया उस मां को बांट नही सकता। भूखा मरना मुझे गंवारा जूते चाट नही सकता। गांडीव हाथ में लेकर जैसे अर्जुन रण में कूदे थे। एक अकेला अर्जुन उस पर सौ सौ कौरव जूझे थे।। वैसे ही मै निकल पड़ा हूं कलम हाथ में लेकर के। काव्यकुंड के महायज्ञ में शब्द हव्य में देकर के।। शब्द मात्रा छंद ज्ञान की रचना केवल दासी है। जिसका चित्त शुद्ध होता है उसके हृदय में काशी है।। चाहे कोई ज्ञानी आए ज्ञान नही मै म...

हम पहरेदार कमल के हैं

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मैं दरबारी कवि नही जो बिक जाता हो कौड़ी में। मेरी कलम तोड़ दे जो ताकत नही हथौड़ी में।। जो महायुद्ध हुआ भारत में उसका पूरा रण हूं। भारतवासी जितने मेरे सबका मैं उच्चारण हूं।। है ऐसी कोई हवा चली जो देश जलाने को चाहे। जो शांतिदूत से छल करके परिवेश मिटाने को चाहें।। ऐसी हवा हवा ही क्या आंधी से टकरा जाऊं। ऐसे कई बवंडरों से क्या यूं ही मैं घबरा जाऊं।। ये हवा बवंडर तो साधारण हम तूफान रोकने वाले हैं। सागर के मंथन का जहरीला उफान रोकने वाले हैं।। हम शिव शंकर से प्रलयंकर हमको देते वर गंगाधर। हम अपनी कविता में गाते जय शिव शंकर जय हर हर हर।। हम उन सबका रथ मोड़ेंगे जो गद्दार वतन के हैं। हमको हलके में मत लेना हम पहरेदार कलम के हैं।।      डॉ.अमन शुक्ला शशांक स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित रचना akhindipoetry@gmail.com

यार सारे हैं मेरे तूफानी

यार सारे मेरे तूफानी हैंअरे मुझको तो यारी निभानी है।इक सज्जन मिले थे मुझे खानदानी।वो कहने लगे इक गल है बतानी।।लफंगे हैं तेरे सभी दोस्त सुनले।रहना बचके इनसे मेरी बात गुनले।।हैं रोटी सेंकू ये।लगते हैं फेंकू ये।।दिखते हैं लुच्चे ये।लगते हैं तुच्चे ये।।यार सारे हैं तेरे ससुर नाती।अरे दुनिया ये हमको है भड़काती।।*तो तूने क्या कहा*यारों की यारी दिखानी हैं।मुझको तो यारी निभानी है।।इनसे शुरू होती इनपे खतम होती।रिश्ता है ऐसा जैसे बोतल में रम होती।।यार सारे मेरे तूफानी हैं।हमको तो यारी निभानी है।।हैं नीचा दिखाती सभी रिश्तेदारी।मुसीबत में आती है सिर्फ काम यारी।।सुख में साथ देते है दुःख में साथ देते हैं।जब भी मैं भटका मुझे थाम लेते हैं।।मेरे यारों की ऐसी कहानी है।अरे हमको तो यारी निभानी है।।जैसे भोले बच्चे ये हैं दिल के अच्छे हैं।नही धागे कच्चे ये हैं दिल के सच्चे हैंजब भी बुलाता हूं ये दौड़े आते हैं।जब रूठ जाता हूं मुझको मनाते हैं।।केसर की खुशबू से ये जाफरानी हैंअरे हमको तो यारी निभानी है।। डॉ.अमन शुक्ला "शशांक"

अमन शुक्ला शशांक - देहरादून

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