हम पहरेदार कमल के हैं

मैं दरबारी कवि नही जो बिक जाता हो कौड़ी में।
मेरी कलम तोड़ दे जो ताकत नही हथौड़ी में।।
जो महायुद्ध हुआ भारत में उसका पूरा रण हूं।
भारतवासी जितने मेरे सबका मैं उच्चारण हूं।।
है ऐसी कोई हवा चली जो देश जलाने को चाहे।
जो शांतिदूत से छल करके परिवेश मिटाने को चाहें।।
ऐसी हवा हवा ही क्या आंधी से टकरा जाऊं।
ऐसे कई बवंडरों से क्या यूं ही मैं घबरा जाऊं।।
ये हवा बवंडर तो साधारण हम तूफान रोकने वाले हैं।
सागर के मंथन का जहरीला उफान रोकने वाले हैं।।
हम शिव शंकर से प्रलयंकर हमको देते वर गंगाधर।
हम अपनी कविता में गाते जय शिव शंकर जय हर हर हर।।
हम उन सबका रथ मोड़ेंगे जो गद्दार वतन के हैं।
हमको हलके में मत लेना हम पहरेदार कलम के हैं।।

     डॉ.अमन शुक्ला शशांक
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित रचना
akhindipoetry@gmail.com

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