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राम धमनियों में बहते अतुलित रक्त का हैं प्रवाह।

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राम धमनियों में बहते अतुलित रक्त का हैं प्रवाह। राम बसे अंतस में मेरे  मेरी सांसे हैं गवाह।। हैं राम धरा और राम गगन और राम मिलेंगे चहूँ ओर। मन का कुहास जो हट जाए तो दिखेंगे चहूँ ओर।। राम मिलेंगे तुमको भी जो सबरी माता को जानो। राम मिलेंगे तुमको भी पहले तुम खुद को पहचानो।। मन को पापी करने वालों राम न ऐसे दिखते हैं। जीवन श्रापी करने वालों राम न ऐसे दिखते हैं।। राम के दर्शन पाने को खुद पुण्य कमाना पड़ता है। दुनिया के असहायों पर खुद प्रेम लुटाना पड़ता है।। राम के दर्शन पाने को मर्यादा,आदर्श जगाना पड़ता है। राम के दर्शन पाने को ,खुद को राम बनाना पड़ता है।। Dr Aman shukla "Shashank" Book a show :- 9721842302

शाम होते ही तेरा इंतजार है

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मेरा दिल तेरा तलबगार है। कैसी बेवफाई तेरा कैसा प्यार है।। मैं तुझसे दूर जाना चाहता हूं मगर। शाम होते ही तेरा इंतजार है।। डॉ. अमन शुक्ला शशांक

मुक्तक

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मॉल सस्ता है तू तू हजारी नही। हारने वाली खेली मैंने पारी नही तुझे साथ लेकर मैं जाता मगर। क्या करूं अब तू कुंवारी नहीं।। डॉ. अमन शुक्ला शशांक

मुक्तक

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गले से जो नही उतरे हम ऐसा जाम लेते हैं। सुबह से शाम तक हम तो तेरा ही नाम लेते हैं। ये तुझसे दूर रहने की मेरी कैसी है मजबूरी। तेरी जब याद आती है तो दिल को थाम लेते हैं।। डॉ. अमन शुक्ला शशांक

ऑपरेशन सिंदूर

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बच्चे आंख नहीं दिखाते कभी बाप की ओर। वर्ना बच्चों की बर्बादी का आ जाता है दौर।। Dr. Aman Shukla"Shashank"

मेरी कविता

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मां वाणी से कविता को आरम्भ किया करता हूं मैं। भारत के जयघोषों से प्रारम्भ किया करता हूं मैं।। सद्पुरुषों का खूब बखान किया करता हूं कविता में। और भारती का गुणगान किया करता हूं कविता में।। जब मेरे अंतस की ज्वाला जलती है तब लिखता हूं। भारत मां की साल दुसाला जलती है तब लिखता हूं।। क्रांति सदा लिखता हूं, मैं सतरंगी गीत नहीं लिखता।। और प्रेयसी के पैरों का मैं संगीत नही लिखता। मैं कविता में लिखता हूं केवल वीर सपूतों को। भारत मां के सच्चे प्रहरी राष्ट्र के रक्षक दूतों को।। अशफ़ाकउल्ला , राजगुरु ,और भगत को लिखता हूं। सोनचिरैया वाले खोए स्वर्ण,रजत को लिखता हूं।। कोई रोक नही सकता है आईने को दिखने से। कोई रोक नही देश भक्ति को लिखने से।। मैं लिखता हूं भारत मां की बिंदी को। मैं लिखता हूं जन भाषा को हिन्दी को।। शर्म कभी न आती होगी आतंको के सागर को। शर्म कभी न आती होगी जननी के सौदागर को।। कोई चीरहरण करता है भारत मां के दामन का। कोई रूप बना लेता है गद्दारी में वामन का।। मैं ऐसे गद्दारों की कांख में चुभता तिनका हूं नींद उड़ा देता हूं उनकी आंख में चुभता तिनका हूं।। मेरी कविता टकराती है गिद्धो...

परशुराम

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उसको हल्के में मत लेना जो नारायण अंशी हो। अंश परमब्रह्म का हो ऋषिकुल ब्राम्हण वंशी हो।। खुद शिव शंकर जिनके गुरु हुआ करते हों। सार सभी वेदों का जो अपने माथे धरते हों।। जिसके चलने से ही केवल धरती थर थर करती हो।। जिसके पैरों की रज अवनी अपने माथे धरती हो। जिसने अपनी पितृ भक्ति में शीश मातु का काट दिया। मातृभक्ति में जिसने धरती से असुरों को छांट दिया।। जिसने अपने पौरुष से विश्व सदा जीता जो। जिसका फरसा अरिदलों का रक्त सदा पीता हो।। दयाधर्म ऐसा जो जीता सब दान दे दिया। पुनः क्षत्रियों के हाथों में धर्म ध्वजा सोपान दे दिया।। ऐसे महापुरुषों का खूब बखान किया करता हूं। अपने लेखन में उनका सम्मान किया करता हूं।। ऋषि अत्री के घर में भी तो एक अवतारी राम हुआ। शिव से प्राप्त किया जब परशु तब है परशुराम हुआ।। Dr. Aman Shukla "Shashank"